रविवार, 16 अगस्त 2015

-आजादी क्या है

आजाद भारत आज भी गुलाम है। अंग्रेजों के चले जाने से हमें सिर्फ संवैधानिक आजादी मिली है। क्या हम सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से आजाद हैं? संविधान कहता है कि हांआजाद हैं, लेकिन वास्तविकता क्या कहती है? चंद दिनो पूर्व ही हम जैन लोगो सामाजिक आजादी पर कुठाराघात हुआ है! हमारी सामाजिक व धार्मिक आजादी संथारा पर प्रतिबंध फिर हम आजाद केसे हुए ?
  हम बात अगर देश की आज़ादी की करें तो बस मन में टीस के अलावा कुछ नहीं होती है. भाइयो बहनो
हम तो अब भी स्वतंत्र नहीं है और तब भी नहीं थे. पहले फिरंगियों के ग़ुलाम थे और अब इन कमीने नेताओं के! चारो ओर ज़रा आँखें बन्द करके नज़र दौड़ाईये, खोल के नहीं! आप पाएंगे कि भारत में अधिकतम सिर्फ़ 5% लोग ही आज़ादी ख़ास कर आर्थिक और सामजिक आज़ादी का फायेदा उठा रहे हैं, उनमें है हमारे नेता, बॉलीवुड सितारे और धर्म की आर्थिक दुकाने चलाने वाले ! बाक़ी सब दर्शक की भांति उन्हें टीवी पर देखते हैं और अपना सब कुछ में से बहुत कुछ गंवा कर उन जैसा बनने की कोशिश करते हैं या फ़िर बाक़ी सब की हालत सिर्फ़ क़व्वाली गाने वाले के पीछे बैठे ताली बजाने वालों से बढ़कर कुछ नहीं होती है!!!जब मैं (विद्रोही )आज़ादी के बारे में सोचता हूँ तो मैं पूरी सृष्टि के हर-एक मानव कि आज़ादी के बारे में सोचता हूँ, मानव ही क्या पूरी सृष्टि में हर-एक के लिए! यहाँ हम विस्तार में आगे जाने से पहले कुछ व्यक्तिगत विचार आप तक पहुँचाना चाहूँगा. कुल मिला कर एक वाक्य में कहें तो पूरी मानवजाति की में जब एकता हो तो यह वास्तविक आज़ादी होगी! परन्तु अगले ही क्षण एक सवाल मन में आता है कि क्या यह संभव है?आज़ादी तो तब ही होगी जब हम देश के, समाज के ग़लत तत्वों के उत्पीडन से आज़ाद न हो जाएँ, आज़ादी तो तब ही होगी जब अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी हो (अभिव्यक्ति का मतलब यह नहीं किसी को गाली देने का मन हो तो बक दिया, अपनी सार्थक और सत्य बातें कहने की आज़ादी अभिव्यक्ति की असल आज़ादी कहलाती है), आज़ादी तो तब ही होगी जब हिंसा का दुरुपयोग न होगा, आज़ादी तो तब ही होगी जब देश के हर एक व्यक्ति की सेहत की सुरक्षा के लिए एक आम और सशक्त योजना हो और उस पर इमानदारी से कार्यान्वयन हो, आज़ादी तो तब ही होगी जब अपनी शक्तियों का ग़लत इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति का खात्मा होगा।क्या हम दूसरों की मदद के लिए आज़ाद हैं? आपका जवाब होगा "हाँ" मेरा इसके विलोम जवाब है "नहीं". आईये देखे कैसे? एक साइकिल सवार को एक चार पहिया वाहन रौंद कर चल देता है और वह तल्पने लगता है! इमानदारी से जवाब दीजियेगा... क्या आप उसकी मदद के लिए आगे बढ़ेंगे? क्या आप उसकी मदद के लिए आगे बढ़ने से पहले ये नहीं सोचते कि जाने दो भाई कौन कानूनी पछडे में पड़ेगा, कौन पुलिस वुलिस के चक्कर में पड़ेगा? अब आपका जवाब क्या है??? ये कैसा क़ानून ये कैसी आज़ादी कि अगर हम किसी की दिल से अंतर्मन से मदद करना चाहें तो भी न कर सकें !मैं तो उसी दिन आज़ादी का असल मायने बता पाने में सक्षम हो सकूँगा जब इस देश बल्कि पूरी दुनियाँ में अमीर-ग़रीब का फासला ख़त्म होगा, उसी दिन आज़ादी का असल मायने बता पाने में सक्षम हो सकूँगा जब गोरे-काले का ज़मीनी स्तर पर, दिल के स्तर पर फासला खात्मा होगा, उसी दिन आज़ादी का असल मायने बता पाने में सक्षम हो सकूँगा जब ऊँच ज़ात-नीच ज़ात का वाहियात तंत्र ख़त्म होगा, उसी दिन आज़ादी का असल मायने बता पाने में सक्षम हो सकूँगा जब एक बलात्कारी को मौत की सज़ा देने का प्रावधान  हो सके!अब बताईये क्या हम वाक़ई सक्षम है आज़ादी के मायने अपनी ज़िंदगी में बताने के लिए !!!???
उत्तम जैन (विद्रोही )


सोमवार, 29 जून 2015

माँ मुझे बड़े होते हुए फुले नही समाती थी


माँ मुझे बड़े होते हुए फुले नही समाती थी
गर्व से सीना यू फूलाती थी !
मेरा बेटे के कदम बढ़ रहे है जवानी की तरफ
कुछ दिनो की बात है फिर मेरा राज है
बेटा बहू लाएगा ओर मेरा दूध का फर्ज निभाएगा !
मेरी इस ढलती उम्र मे कुछ आराम दिलाएगा
मेरे मूलधन का सूद पोते पोती के रूप मे चुकाएगा !
सोचा था माँ का सपना कुछ हद तक सफल भी होगा
मंजूर ए खुदा कुछ ऐसा होगा माँ खुश मेरा जीवन सफल होगा !
वक़्क्त के साथ कुछ ऐसा हुआ मेरे फेरे हुए माँ के अरमान पूरे हुए
पर आधुनिकता मे जीने वाली बहू के सहारे
मा के सपने चकनाचूर हुए !
खुद को बुद्धिजीवी समझने वाली पत्नी ने माँ के सपने कर दिये चकनाचूर
सास से ज्यादा माँ के गूणगान शुरू कर दिये !
बोलती पत्नी मेरी माँ जेसी कोई हो नही सकती
तेरी माँ जेसी क्रूर इस दुनिया मे मिल नही सकती !
तुम ही बताओ दोस्तो माँ -- ओर माँ मे इतना फर्क क्यू
पति की सास ओर पत्नी की सास मे फर्क क्यू ?
जिस पति की सास ने पत्नी की सास के विरुद्ध समझाया है !
खुद की बेटी का भविष्य को दुखदायी बनाया है !
जो बहू सास को सन्मान न दे पायी है
लानत है तुझ पर तेने तेरी माँ की कोख लझाई है........... उत्तम जैन विद्रोही

रविवार, 7 जून 2015

ये अक्षय बट है

मुझे नहीं मालूम किसी के लिए अच्छे दिन का क्या मतलब है। मेरे लिए मेरे धर्म,मेरे देश,मेरी संस्कृति के उत्कर्ष के क्षण ही मेरे अच्छे दिन हैं। एक हजार वर्षो की कालिमा को भेद कर हिंदुत्व का सूर्य उदित होना ही मेरे अच्छे दिन हैं। इस सूर्योदय से निशाचरों का परेशान होना स्वाभाविक है। सूर्योदय से सारी दुनिया प्रफुल्लित होती है बस उल्लुओं और चमगादड़ों को निराशा।
"सर्वे भवन्तु सुखिनः " मात्र एक परिकल्पना नहीं है। योग उसको कार्यरूप में साकार करने का नाम है। स्वामी रामदेव द्वारा वैज्ञानिक प्रामाणिकता के साथ योग की सभी को स्वस्थ रखने की क्षमता के प्रदर्शन ने सम्पूर्ण विश्व का ध्यान योग की ओर आकृष्ट किया है। आज करोड़ों लोग इससे लाभान्वित होकर स्वस्थ जीवन जी रहे हैं साथ ही चिकित्सा पर होने वाले अरबों रुपये की बचत कर रहे हैं। पूरे विश्व को अपना परिवार माननेवाला हिन्दू जीवन दर्शन योग के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को आलिंगनबद्ध कर रहा है। ये संभव हुआ है सात्विक और स्वाभिमानी राजनीतिक नेतृत्व के कारण। क्या स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यूनतम खर्च करके सबको स्वस्थ रखना किन्ही अच्छे दिनों से कम है?
योग का विरोध विशुद्ध रूप से पूर्वाग्रह ग्रस्त मानसिकता का परिचायक है और जन सामान्य के कल्याण का विरोधी है। जिन्हे सदैव हिन्दू जीवन दर्शन पिछड़ा लगा हो उन्हें उसके इस एक चमत्कार से परेशान होना स्वाभाविक है। इसके संवाहकों के प्रति उनका विषवमन भी स्वाभाविक ही है। क्रान्तिकारी लगने की मानसिकता से पीड़ित छुद्र लोगों ने ४,जून को स्वामी रामदेव के उत्पीड़न पर तो क्षोभ व्यक्त नहीं किया पर उसे सलवार दिवस घोषित कर दिया। जबकि रामदेव का उनसे कोई प्रत्यक्ष विरोध नहीं है। स्वयंभू ईमानदारों का भारतीयता से चिरपरिचित विरोध ही इस विरोध का मूल कारण है।
ये अंधविरोधी याद रखें सनातनता अपनी जीवंतता के लिए किसी की कृपा की मोहताज नहीं है। सूर्य को ढकने के उपक्रम से सूर्य को नष्ट नहीं किया जासकता। तुम सूर्य नमस्कार करो या नहीं लेकिन सूर्य की उपेक्षा तुम्हारे अल्लाह और तुम पर ही भारी पड़ने वाली है। प्रकाश के आराधक होते तो सबके कल्याण की कामना करते। अँधेरे से अंधे हुए लोगों ने पूरी धरती को खून से लाल कर दिया है। क्या इस खून की लाली से सूर्य की लालिमा अच्छी नहीं है ?
हमारी सनातनता ने हमें सनातन प्रतीकों और आस्थाओं के साथ साथ जीना सिखाया है। तुमने सिर्फ खजूर देखा होगा हमने बट वृक्ष देखा है। तुम खोखली अकड़ के साथ खाम्खा अकड़े रहने वाले हो। हम बट वृक्ष हैं। तुम जैसों की हमें ख़त्म करने की हजार कोशिशों के बाबजूद हम अपराजेय हैं। हमारी सनातनता तुम्हारी क्षणभंगुरता पर हमेशा भारी पड़ेगी। योग का अर्थ होता है जोड़ना हम सबको जोड़ना और सबसे जुड़ना चाहते हैं। हमारा यही चरित्र योग के रूप में एक हजार वर्षों के बाद नयी कोपलों और शाखाओं के साथ पूरे विश्व को अपनी शीतल छाँव देने जारहा है।

शनिवार, 6 जून 2015

महिलाओं के संस्कारी होने की मांग करना क्या स्त्रीयों की स्वतंत्रता में बाधक है ??

मानव जाति के इतिहास में विभिन्न प्रकार की विभिन्नता की कहानी जुड़ी हुयी है, इस इतिहास में हमने बहुत प्रकार के वर्ग निर्मित किए, जैसे गरीब का, अमीर का, धन के पद के अभाव पर और आश्चर्य की बात यह है कि इस समाज ने जो स्त्री और पुरुष के बीच जो वर्ग का निर्माण किया यह एक अनोखा और अद्भुत रहा और इस भिन्नता को वर्ग बनाना मनुष्य की शेतानी कही जा सकती है। क्योंकि हजारों वर्ष पहले से ही स्त्री का शोषण का इतिहा रहा है। क्योकि पुरुष ने ही सारे कानून निर्मित किये है और शुरु से ही पूरुष शक्तिशाली था उसने स्त्री पर जो भी थोपना चाहा थोप दिया । और जब तक स्त्री पर से गुलामी नही उठती दुनिया से गुलामी नही मिट सकती चाहे कहने की बात क्यो न हो की भारत 68 साल पहले ही आजाद हो गया। ये अलग बात है कि हमारी सरकार गरीबी और अमीरी के फासले मिटाने मे सक्षम हो जाए लेकिन स्त्री और पुरुष के बीच शोषण का जाल और इनके बीच फासलो की कहानी इतनी लम्बी हो गयी है कि स्वयं स्त्री और पुरुष दोनो ही भूल गये है। पुरुष और स्त्री के बीच फासले और असमानता किस-किस रुप में खड़ी हुई है? भिन्नता सुनिश्चित  है भिन्न होनी ही चाहिए क्योंकि यही ही स्त्री,पुरुष को अलग-अलग व्यक्तित्व देते है लेकिन भिन्नता असमानता में बदल गया है। इसीलिए सारी स्त्रीयाँ भिन्नता को तोड़ने में लग गयी है ताकी वे ठीक पुरुषों जैसी दिखने लगे शायद वह इस सोच में है कि इस भाती असमानता भी टूट जाएगी धीरे-धीरे कपड़े एक जैसे होते चले गये। लेकिन कपड़ो के फासले से भिन्नता नही मिट जाएगीं यह एक गहरी बात है कपड़ो से कुछ फर्क  नही पड़ने वाला नही है क्योंकि भेद मिटाने से समाज द्वारा निर्माण किया गया स्त्री और पुरुष का वर्ग नही मिट सकता क्योकि पुरुष इस का आदि हो गया है।  भारत में आज तक स्त्री पुरुषो में बराबरी का स्तर नहीं आ पाया , स्त्रीयों को आज भी असमानता की भावना का सामना करना पड़ रहा है आज भी स्त्रीयों को समाज में दोयम दर्जे का स्थान ही प्राप्त है. अधिकाँश स्थानों पर महिलाओं का यही हाल है , महिलाओं के स्वास्थ्य एवं शिक्षा की स्थिति बहुत ही खराब है घरेलु वातावरण में रोज़ ही वो किसी न किसी दुर्व्यवहार का सामना करती ही रहती हैं. आज भी महिलाओं को घर से बाहर जाकर काम करने में एक बड़े पुरुष वर्ग को आपत्ति है. पर बढ़ते वैश्वीकरण के दबाव में इन सब शोषित और कुपोषित मातृत्व वर्ग के बीच एक ऐसा महिला वर्ग भी उपजा जो की इन सब असमानताओ , कुपरिस्थितियो और समस्याओं से पूर्णतया मुक्त था अब इनमे भी दो तरह की महिलाए थी एक जो पारिवारिक संस्कार , सद्चरित्रता और सदभावना से ओत प्रोत थीं वही दूसरी जो की पारिवारिक संस्कार , सद्चरित्र इत्यादि बातो से पूर्णतया दूर एवं इन सुसंस्कारो को अपना बंधन मात्र मानती थी. पहला वर्ग तो अपने सदभावना  के कारण अपने अन्य शोषित बहनों के मुक्ति का मार्ग ढूढ़ने लगी और अपने परिवार को भी संस्कारी बनाये रखा अतः उन परिवार से निकलने वाले संस्कारी बालक , बालिकाए उनके सुविचारो के वाहक बन गए और महिला मुक्ति के मार्ग भी.दूसरी तरफ वे महिलाए थी जो की न तो संस्कार जानती थी न ही सद्चरित्र उनके लिए अपने संस्कृति अपनी परम्पराओं को तोड़ना ही स्वतंत्रता हो गया और ये भी आंकलन नहीं की की क्या सही है क्या गलत ? जो भी पश्चिम से मिला सब सर्वश्रेष्ठ है इस भावना से अपना विरोध और दूसरो को गले लगाने का एक नया परंपरा शुरू हो गया ये महिलाए स्वयं तो संस्कारी थी ही नहीं सो इनके बच्चे को  भी इन्ही के रास्ते पर जाना तय था.
ऐसी कुविचारी , निकृष्ट ,कुचरित्र महिलाओं ने कभी भी अपने महिला समाज का उठाने में कोई भूमिका नहीं अपनाई बल्कि अपने परिवार में असंस्कारी बालक बालिकाओं को रोपित कर समाज की स्थिति और खराब करने में जिम्मेदारी निभायी. पुरुषो से ज्यादा महिलाओं को संस्कार की जरुरत होती है पुरुषो से ज्यादा महिलाओं को नैतिक होने की जरुरत होती है, क्योकि महिलाए ही परिवार की आधार होती है. वो ही बच्चो की प्रथम गुरु होती है, वही बच्चो को संस्कारी बनाती है. और यह एक सामान्य दृष्टि की बात है की हम बहुधा देखते है की जिस घर में पिता निकृष्ट , शराबी या नीच कोटि का निकल जाता है वह यदि माता ठीक होती है तो बच्चे अपने पिता के दुर्गुणों से दूर गुणी  और बुद्धिमान ही होते है जबकि किसी परिवार के सभी पुरुष ठीक हो लेकिन महिला खराब हो गयी तो निश्चित ही उस परिवार की पूरी अगली पीढीयां खराब हो जाती है.यदि प्रकृति ने माँ को परिवार का आधार बनाया है तो , उस माँ को संस्कारी होने की मांग करना क्या स्त्रीयों की स्वतंत्रता में बाधक है ?? बहुत सारी पश्चिमी मानसिकता से ग्रसित महिलाए इसे एक घटिया सोच करार देती है और पूछती है की आखिर संस्कार की जिम्मेवारी महिलाओं पर पुरुषो से ज्यादा क्यों ?? क्या इस प्रश्न का कोई जबाब है??
जो प्रश्न प्रकृति से पूछा जाना चाहिए  वो प्रश्न ये महिलाए पुरुषो से जानना चाहती हैं.
अब कोई पुरुष यदि यह पूछे की बच्चे ज्यादा प्रेम माँ से क्यों करते है पिता से क्यों नहीं , स्नेह दिखाने की जीतनी कला स्त्रीयों को प्राप्त है उतनी पुरुषो को क्यों नहीं ??? बच्चो को गर्भ धारण करने की शक्ति सिर्फ महिलाओं को पुरुषो को क्यों नहीं ?? बच्चो के शुरूआती भरण पोषण की शक्ति केवल महिलाओ को क्यों प्राप्त है पुरुषो को क्यों नहीं ??
क्या हम प्रकृति प्रदत्त गुणों पर टकराकर कुछ प्राप्त कर सकते है?
कुछ लोगों ने कहा की स्त्रीयों को मर्यादित कपडे पहनना चाहिए मीडिया में भयंकर विरोध इस मुद्दे पर होता ही रहता है. स्त्री आखिर अपने आप को क्या समझती है यह बात हम उसके वस्त्रो से ही निर्धारित करते है , हमारे देश की परंपरा और संस्कृति में उसे भी आत्मा का दर्ज़ा प्राप्त है न की केवल नीरा शरीर का. जबकि पश्चिम में और अरब की कुसंस्कृति में उन्हें केवल शरीर का ही दर्ज़ा प्राप्त है  एक उसे दिखाने में लगा रहता है तो दूसरा उसे ढकने में. पर क्या यही सोच हमारे समाज में आज नहीं फ़ैल गयी कुछ लोग है जो पर्दा प्रथा को जारी रखना चाहते है तो कुछ उसे नग्नता के उस स्तर पर ले जाने की फिराक में है जहाँ सभ्यों का सर नीचा करके जमीन देखना ही बचाव के एक मात्र लगता है. क्या ये दोनों मार्ग उचित है??
निश्चित ही मेरे मत से नहीं …. यदि स्त्री केवल शरीर नहीं तो उसे क्यों ढकना और क्यों दिखाना? उसे मर्यादित ढंग से रहना ही चाहिए. स्त्रीयों से मर्यादित कपडे की उम्मीद करने पर , पश्चिमी विचारों से ओत प्रोत महिलाए कहने लगती हैं की ये महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन है. आखिर वो कौन सी मानसिकता है जिसके कारण महिलाए जब मर्यादित कपडे पहनती है तो उन्हें ऐसा लगता है मानो उनकी स्वतंत्रता हर ली गयी हो. क्या नग्नता के उचाई पर ही पहुच कर स्वतंत्रता का बोध हो सकता है. कुचरित्र और असंस्कारी महिलाए ही नग्नता में स्वतंत्रता का अनुभव प्राप्त करती है. इसको समझने के लिए एक उदाहरण लेते है ऐसी कल्पना करते है की एक संस्कारी परिवार की बालिका को एक अलग स्थान पर ले जाकर उसे यह कह दिया जाय की तुम जो करना चाहो कर लो जैसा पहनना चाहो पहन लो तुम्हे कोई कुछ नहीं कहेगा तो क्या वह नग्नता का प्रदर्शन करेगीक्या वो निर्लाज्ज़ता को अपना ध्येय चुनेगी?? निश्चित ही नहीं क्योकि उसके दिमाग में ये गन्दगी डाली ही नहीं गयी की स्त्री की स्वतंत्रता का मतलब नग्नता. हम पहले ये घटिया सोच बच्चो में रोपित करते है की शरीर का प्रदर्शन ही स्वतंत्रता है जिस कारण बाद में यह समस्या आती है की मर्यादित कपड़ो में महिलाओं को परतंत्रता का बोध होता है.
यदि वास्तव में भारत वर्ष में स्त्रीयों का विकास करना है तो उन्हें संस्कारी सद्चरित्र और मर्यादित बनाना ही पड़ेगा , क्योकि स्त्रीयां ही समाज की आधार है यदि उनका पतन होगा तो समाज जरुर अधोगति को प्राप्त होगा. ऐसी सोच भी हमारे सामने चुनौती बनकर खडी है जो की महिलाओं के स्वतंत्रता के मुख्य आन्दोलन को जिसमे उनको समाज में बराबरी का हक दिलाना ध्येय को खीच कर ऐसे निकृष्ट मार्ग पर ले जा रहा है जहा पर महिलाए खुद अपने आपको और ज्यादा खराब स्थिति में पाएंगी ......उत्तम जैन (विद्रोही )


शुक्रवार, 22 मई 2015

अकसर छोटी.छोटी बातों को लेकर पति.पत्नी इस हद तक झगड़ पड़ते हैं कि उनकी जिंदगी में सिर्फ तनाव ही रह जाता है जो उन पर इस हद तक हावी हो जाता है कि दोनों का एक छत के नीचे जीवन बसर करना मुश्किल हो जाता है और नौबत तलाक तक पहुंच जाती है। आम जिंदगी में यदि पति.पत्नी कुछ बातों को ध्यान में रखें तो तनाव से बच कर अपने घरेलू जीवन को खुशियों से भर सकते हैं। यदि पति.पत्नी के बीच कभी झगड़ा हो तो दोनों में से एक को शांत हो जाना चाहिए जिससे बात आगे न बढ़े और फिर पति.पत्नी का झगड़ा तो पानी के बुलबुलों की तरह होता है जो पल भर में ही खत्म हो जाता है। युगो  से नर-नारी समानता का एक मूल तथ्य परिचालित किया जाता रहा है कि पुरूष स्त्री की अपेक्षा साधारणतया ज्यादा बड़ा और शक्तिशाली होते हैं और सामान्यतः भौतिक हिंसा में जीत उन्हीं की होती है । मानव सभ्यता के शुरू से ही स्त्रियों को पुरूषों के भौतिक हमलों से स्वयं की रक्षा करनी पडी है । यहां तक कि जब वह क्रोधित नर के सामने अपने आप को असहाय महसूस करती है कई पत्नियां अपनी पति की बातों को लेकर काफी कंफ्यूज रहती है कि आखिर उनके पति अपने मन की बात उनसे शेयर क्यों नहीं करते और उनके पति मन ही मन परेशान क्यों रहते है और खुद ही अपनी सारी मुश्किलों को सुलझाने के लिए प्रयत्न करते रहते है और उनसे कोई भी बात शेयर क्यों नहीं करते । इन्ही कारणों से कभी-कभी पति-पत्नी के बीच में मन मुटाव पैदा हो जाता है और कई पत्नियां जो अपने पति के मन की बातों को समझ लेती है उनके पति उनसे खुश हो जाते है परंतु कई बार पत्नी कंफ्यूज हो जाती है कि आखिर उनके पति की खुशी किस बात में है । इन टिप्स की मदद से आप जान सकती है कि एक पति अपनी पत्नी से क्या चाहता है । 
कुछ टिप्स –
   हर पति अपनी पत्नी से यह अपेक्षा करता है कि उसकी पत्नी उसके अच्छे कार्य करने पर उसकी तारीफ करें    और एसा करने से आपके पति आपसे खुश हो जाएंगे।  पति को ये बात सबसे ज्यादा अच्छी लगती है कि जब वो घर पर रहे तो उसकी पत्नी उसके साथ ज्यादा से  ज्यादा समय व्यतीत करें और जितना भी समय उसके साथ व्यतीत करें वो लम्हें हंसी मजाक से भरे होने चाहिए और लड़ाई झगड़े न हो जिससे रिश्तों में तनाव पैदा हो सकता है ।पति को ये बात सबसे अच्छी लगती है जब उसकी पत्नी घर के छोटे- छोटे कामों में अपने पति की मदद मांगे और काम करने के साथ- साथ आपस में ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत हो सकता है । हर पति यही चाहता है कि उसकी पत्नी सिर्फ उसी से प्यार करें और किसी और उसी को अपनी लाइफ का हीरो मानें 

गुरुवार, 21 मई 2015

आत्मा और मन

आत्मा  और मन क्या है बिना रस्सी के ही शरीर से मन बंधा है, और मन से आत्मा बंधी हुई है| शरीर है, मन है, आत्मा है| जानने वालों ने इसलिए मन को, शरीर और आत्मा के मध्य का सेतु भी कहा है| मन क्या है? शरीर और आत्मा के बीच के पुल का नाम मन है| पर उससे ज्यादा अच्छा तरीका है कहने का, ‘मात्र मन ही मन है, जिसके दो सिरों का नाम शरीर और आत्मा है’| इस सिरे से देखो तो शरीर है, और उस सिरे से देखो तो आत्मा है| और अगर आत्मा के सिरे से देखो तो कहोगे कि बीज है, जो मन के रूप में विस्तार पाता  है, सूक्ष्म विस्तार| और फिर शरीर के रूप में स्थूल विस्तार पाता है तो संसार बन जाता है|  अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मैं शब्द का प्रयोग करता है | परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मैं और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाले सत्ता का स्वरूप क्या है, अर्थात मैंशब्द जिस वस्तु का सूचक है, वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजें तो बना डाली है, उसने संसार की अनेक पहेलियों का उत्तर भी जान लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओं का हल ढूंढ निकलने में खूब लगा हुआ है, परन्तु मैं कहने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता | आज किसी मनुष्य से पूछा जाये कि- आप कौन है ?” तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो धंधा वह करता है वह उसका नाम बता देगा |वास्तव में मैंशब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता आत्माका सूचक है मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिला कर बनता है | जैसे शरीर पाँच तत्वों (जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन, बुद्धि और संस्कारमय होती है | आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है | आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिन्दु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है | जैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिन्दु-सा दिखाई देता है, वैसे ही दिव्य-दृष्टि द्वारा आत्मा भी एक तारे की तरह ही दिखाई देती है | इसीलिए एक प्रसिद्ध पद में कहा गया है- भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा, गरीबां नूं साहिबा लगदा ए प्यारा |” आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यही हाथ लगता है | जब वह यश कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है, तब भी वह यही हाथ लगता है | आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगों में यहाँ ही बिन्दी अथवा तिलक लगाने की प्रथा है | यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिष्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध सरे शरीर में फैले ज्ञान-तन्तुओं से है | आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिष्क तथा तन्तुओं द्वारा व्यक्त होता है | आत्मा ही शान्ति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है | अत: मन और बुद्धि आत्म से अलग नहीं है | परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह- स्त्री, पुरुष, बूढ़ा जवान इत्यादि मान बैठी है | यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है |उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है | शरीर मोटर के समान है तथा आत्मा इसका ड्राईवर है, अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है, उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियंत्रण करती है | आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है, जैसे ड्राईवर के बिना मोटर | अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर  को चला सकता है और अपने लक्ष्य (गन्तव्य स्थान) पर पहुंच सकता है | अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कार चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना का शिकार बन जाता है और कार उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नहीं है वह स्वयं तो दुखी और अशान्त होता ही है, साथ में अपने सम्पर्क में आने वाले मित्र-सम्बन्धियों को भी दुखी व अशान्त बना देता है | अत: सच्चे सुख व सच्ची शान्ति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है   

सोमवार, 18 मई 2015

हालात कहां बदले हैं…. महिला सशक्तिकरण

भारतीय समाज की सबसे बडी विशेषता उसकी अनेकता में एकता की भावना है. यहाँ विभिन्न प्रकार वर्गों के लोग निवास करते है. इनमे विभिन्न प्रकार की परंपराएँ प्रचलित है. वैदिक धर्म यहाँ के अधिकांश भाग का धर्म है. जो विदेशी आये वे इस समाज में मिलते चले गए. कुछ हद तक उन्होंने अपनी मौलिकता भी बनाये रखी. ऐसे बहुविधि समाज में स्त्रियों का अपना विशेष स्थान रहा है. शास्त्रों में लिखा हुआ है कि पत्नी पुरुष का आधा भाग है. वह एक श्रेष्ट मित्र भी है. यह भी कहा जाता है कि जहाँ नारी कि पूजा होती है वहीँ देवता रमण करते है. प्राचीन युग में नारी हर प्रकार से सम्मानित थी. पर आज उसकी स्थिति बिलकुल भिन्न है. उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों कि दशा ठीक नहीं थी. बाल-विवाह प्रचलित हो गया था. वैवाहिक स्वतंत्रता समाप्त हो चुकी थी. बहु-विवाह प्रथा जोरों पर थी. भारतीय समाज शुरू से ही पुरुष  प्रधान रहा है। यहां महिलाओं को हमेशा से दूसरे दर्जे का माना जाता है। पहले महिलाओं के पास अपने मन से कुछ करने की सख्त मनाही थी। परिवार और समाज के लिए वे एक आश्रित से ज्यादा कुछ नहीं समझी जाती थीं। ऐसा माना जाता था कि उसे हर कदम पर पुरुष के सहारे की जरूरत पड़ेगी ही।  लेकिन अब महिला उत्थान को महत्व का विषय मानते हुए कई प्रयास किए जा रहे हैं और पिछले कुछ वर्षों में महिला सशक्तिकरण के कार्यों में तेजी भी आई है। इन्हीं प्रयासों के कारण महिलाएं खुद को अब दकियानूसी जंजीरों से मुक्त करने की हिम्मत करने लगी हैं। सरकार महिला उत्थान के लिए नई-नई योजनाएं बना रही हैं, कई एनजीओ भी महिलाओं के अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने लगे हैं जिससे औरतें बिना किसी सहारे के हर चुनौती का सामना कर सकने के लिए तैयार हो सकती हैं।  आज की महिलाओं का काम केवल घर-गृहस्थी संभालने तक ही सीमित नहीं है, वे अपनी उपस्थिति हर क्षेत्र में दर्ज करा रही हैं। बिजनेस हो या पारिवार महिलाओं ने साबित कर दिया है कि वे हर वह काम करके दिखा सकती हैं जो पुरुष समझते हैं कि वहां केवल उनका ही वर्चस्व है, अधिकार है।  जैसे ही उन्हें शिक्षा मिली, उनकी समझ में वृद्धि हुई। खुद को आत्मनिर्भर बनाने की सोच और इच्छा उत्पन्न हुई। शिक्षा मिल जाने से महिलाओं ने अपने पर विश्वास करना सीखा और घर के बाहर की दुनिया को जीत लेने का सपना बुन लिया और किसी भी हद तक पूरा भी कर लिया है !लेकिन पुरुष अपने पुरुषत्व को कायम रख महिलाओं को हमेशा अपने से कम होने का अहसास दिलाता आया है। वह कभी उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ करता है तो कभी उस पर हाथ उठाता है। समय बदल जाने के बाद भी पुरुष आज भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना पसंद नहीं करते, उनकी मानसिकता आज भी पहले जैसी ही है। विवाह के बाद उन्हे ऐसा लगता है कि सिर्फ मांग मे सिंदूर भरने के साथ ही  अब अधिकारिक तौर पर उन्हें अपनी पत्नी के साथ मारपीट करने का लाइसेंस मिल गया है। शादी के बाद अगर बेटी हो गई तो वे सोचते हैं कि उसे शादी के बाद दूसरे घर जाना है तो उसे पढ़ा-लिखा कर खर्चा क्यों करना। लेकिन जब सरकार उन्हें लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं लालच देती है, तो वह उसे पढ़ाने के लिए भी तैयार हो जाते हैं और हम यह समझने लगते है कि परिवारों की मानसिकता बदल रही है। दुर्भाग्य की बात है की बातें और योजनाएं केवल शहरों तक ही सिमटकर रह गई हैं। एक ओर बड़े शहरों और मेट्रो सिटी में रहने वाली महिलाएं शिक्षित, आर्थिक रुप से स्वतंत्र, नई सोच वाली, ऊंचे पदों पर काम करने वाली महिलाएं हैं, जो पुरुषों के अत्याचारों को किसी भी रूप में सहन नहीं करना चाहतीं। वहीं दूसरी तरफ गांवों में रहने वाली महिलाएं हैं जो ना तो अपने अधिकारों को जानती हैं और ना ही उन्हें अपनाती हैं। वे अत्याचारों और सामाजिक बंधनों की इतनी आदी हो चुकी हैं की अब उन्हें वहां से निकलने में डर लगता है। वे उसी को अपनी नियति समझकर बैठ गई हैं।  हम खुद को आधुनिक कहने लगे हैं, लेकिन सच यह है कि आधुनिकता सिर्फ हमारे पहनावे में आया है लेकिन विचारों से हमारा समाज आज भी पिछड़ा हुआ है। आज महिलाएं एक कुशल गृहणी से लेकर एक सफल व्यावसायी की भूमिका बेहतर तरीके से निभा रही हैं। नई पीढ़ी की महिलाएं तो स्वयं को पुरुषों से बेहतर साबित करने का एक भी मौका गंवाना नहीं चाहती। लेकिन गांव और शहर की इस दूरी को मिटाना जरूरी है।

उत्तम जैन (विद्रोही )